Shrimadbhagwat Mahapurana- A Brief Introduction

Amongst the 18 Purana composed by Ved Vyas, Shrimadbhagwat holds utmost importance as the holiest Purana. In this scripture the various stories of Krishna Leela have been narrated in the most beautiful manner. The scripture has stories of Lord Krishna in his supernatural and divine form. Apart from the tales, there are accounts of the devotees of Krishna and their stories of attaining salvation.

In this Mahapurana, there are 18 thousand verses, 12 wings and 335 chapters. Shrimadbhagwat recital and the Yagya take about 7days to complete. Just like Ganga is superior amongst rivers and Kashi is above all the pilgrimages likewise, Shrimadbhagwat is highest revered scripture amongst other Puranas. It is the sacred most scripture in the Hindu and Vaishnav sects. In this scripture, the crux of Vedas, Upanishads along with several secret topics have been discussed in the simplest of language so that everyone can understand it. To call Shrimadbhagwat the encyclopaedia of Hindu religion and culture shall be not considered as an exaggeration. For over centuries, this Purana has been able to maintain the decorum of Hindu faith, society and culture.

A fine synchronization of Sakaam Karma, Nishkaam Karma, Gyan Sadhna, Siddhi Sandhna, Devotion, Mercy, Values, Dwait Adwait, Nirguna Saguna and Vyakta Avyakta can be found in Shrimadbhagwat. The scripture is like a treasure trove. It offers an insight on divine, metaphysical and spirituality. This scripture is a great piece of work that make one realize about wisdom, devotion and Vairagya.

There are 12 wings in this scripture in which the incarnated forms of Vishnu are described. In Naimisharanya pilgrimage, the son of Lomharshan, Ugrashava Sutji narrated about 24 incarnation of Lord Krishna on the request of the Shaunkaidi Sages.

Shrimadbhagwat has also been called the Kalp Tree as by merely listening to it one gets rewarded. By hearing the recital of Shrimadbhagwat cleanses even the sinful heart. It helps in distancing the diffidence and in attainment of peace and salvation. Hearing the recital of Shrimadbhagwat clears the sins of the lifetime and lead towards divinity and spirituality. Where in other Yugas, one has to put efforts to attain salvation and forgiveness from sin, in Kaliyuga merely listening to Shrimadbhagwat can turn out to be fruitful. Ignorance also fades away with the hearing of Shrimadbhagwat. The composition is just Kalp Tree with the help of which all the wishes come true.

Shrimadbhagwat is an important link between God and the devotee; it is this scripture that brings the worshipper close to his idol. The recital and hearing of the Shrimadbhagwat is for the betterment of the human being. It is important for each person to listen to Shrimadbhagwat recital at least once in a lifetime. By merely hearing the scripture all the sins of the man are forgiven and erased. There occurs the attainment of wisdom.

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श्रीमद्भागवत महापुराण संक्षिप्त परिचय

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित 18 पुराणों में श्रीमद्भागवत सबसे श्रेष्ठ एवं पवित्र पुराण है । यह पुराण समस्त पुराणों का सार है । इस महापुराण में भगवान श्रीकृष्ण (विष्णु अवतार) की अनेक लीलाओं और कथाओं का सुंदर वर्णन विस्तार से किया गया है । 'श्रीमद्भागवत पुराण' में भगवान श्रीकृष्ण के ईश्वरीय और अलौकिक रूप का दिव्य वर्णन किया गया है। कथाओं के अलावा इस महापुराण में भगवान के भक्तों और उनकी मुक्ति की कथाओं का भी विस्तार से वर्णन किया गया है ।

इस महापुराण में 18 हजार श्लोक, 12 स्कन्ध और 335 अध्याय हैं । श्रीमद्भागवत कथा महापुराण ज्ञान यज्ञ का आयोजन 7 दिनों में सम्पादित होता है । जिस प्रकार से नदियों में गंगा, तीर्थों में काशी का महत्त्व है, उसी प्रकार पुराणों-वेद शास्त्रों में श्रीमद भागवत महापुराण का अपना एक सर्वश्रेष्ठ स्थान और महत्त्व है . हिंदू समाज और वैष्णव संप्रदाय का यह एक प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ हैं . इस ग्रन्थ में वेदों, उपनिषदों तथा दर्शन शास्त्र के गूढ़ एवं रहस्यमय विषयों को अत्यन्त सरलता के साथ निरूपित किया गया है। श्रीमद भागवत महापुराण को भारतीय धर्म और संस्कृति का विश्वकोश कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा। सैकड़ों वर्षों से यह पुराण हिन्दू समाज की धार्मिक, सामाजिक और लौकिक मर्यादाओं की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता आ रहा हैं।

इस पुराण में सकाम कर्म, निष्काम कर्म, ज्ञान साधना, सिद्धि साधना, भक्ति, अनुग्रह, मर्यादा, द्वैत-अद्वैत, द्वैताद्वैत, निर्गुण-सगुण तथा व्यक्त-अव्यक्त रहस्यों का समन्वय उपलब्ध होता है। 'श्रीमद्भागवत पुराण' वर्णन की विशदता और उदात्त काव्य-रमणीयता से ओतप्रोत है। यह विद्या का अक्षय भण्डार है। यह पुराण सभी प्रकार के कल्याण देने वाला तथा त्रय ताप-आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक आदि का शमन करता है। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का बोध कराने वाला यह एक महान ग्रन्थ है।

इस पुराण में बारह स्कन्ध हैं, जिनमें विष्णु के अवतारों का ही वर्णन है। नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों की प्रार्थना पर लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सूत जी ने इस पुराण के माध्यम से श्रीकृष्ण के चौबीस अवतारों की कथा कही है।

श्रीमद्भागवत को कल्प वृक्ष माना गया है जिसके श्रवण मात्र से सभी प्रकार के फल प्राप्त होते हैं । भागवत कथा श्रवण से मन का शुद्धिकरण होता है। इससे संशय दूर होता है और शांति व मुक्ति मिलती है। श्रीमद भागवत कथा श्रवण से जन्म जन्मांतर के विकार नष्ट होकर प्राणी मात्र का लौकिक व आध्यात्मिक विकास होता है। जहां अन्य युगों में धर्म लाभ एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए कड़े प्रयास करने पड़ते हैं, कलियुग में कथा सुनने मात्र से व्यक्ति भवसागर से पार हो जाता है। सोया हुआ ज्ञान वैराग्य कथा श्रवण से जाग्रत हो जाता है। कथा कल्पवृक्ष के समान है, जिससे सभी इच्छाओं की पूर्ति की जा सकती है।

भक्त और भगवान के बीच एक कड़ी श्रीमद्भागवत है, जो भक्त को भगवान के समीप पहुंचाता है। भागवत कथा का पाठन और श्रवण दोनों मानव कल्याण के लिए है। जीवन में हर इंसान को एक बार भागवत कथा का पाठ या श्रवण करना जरूरी है। कथा के श्रवण मात्र से मनुष्य के सारे दोष मिट जाते हैं। निर्मल बुद्धि का प्रसार होने लगता है।

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